महात्मा गाँधी के विचार–दर्शन पर स्थापित सुशीला इन्द्रदेव शर्मा विद्या संस्थान श्री रास बिहारी मिशन द्वारा सीबीएसई पाठ्यक्रमानुसार संचालित कल्याणार्थ विद्यालय है।
इस विद्या संस्थान की स्थापना इसके प्रेरणास्रोत श्री इन्द्रदेव शर्मा एवं श्रीमती सुशीला शर्मा के पावन प्रेम को समर्पित करते हुए की गई है। शिक्षाविद् श्री इन्द्रदेव शर्मा तथा करुणामयी श्रीमती सुशीला शर्मा को इस भूमि से अत्यन्त आत्मीय लगाव था। उन्होंने यहाँ की सामाजिक तथा शैक्षणिक स्थिति को देखकर हमेशा गहरी चिंता व्यक्त की थी। इस संस्थान की नींव उस समय रखी गई जब उनकी पुत्री डॉ. सुजाता चौधरी ने इल्मासनगर की दलित बस्ती में रह रहे बच्चों की दयनीय स्थिति को देखकर कुछ ठोस करने का निश्चय किया। प्रारम्भ में केवल दलित बच्चों को पढ़ाने के उद्देश्य से चार कमरों का एक छोटा केन्द्र बनाया गया। बाद में, उन्होंने अपने माता–पिता की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के संकल्प के साथ यहाँ एक पूर्ण सीबीएसई मान्यता प्राप्त चैरिटेबल विद्यालय स्थापित करने की दिशा में कदम उठाया। जब डॉ. सुजाता चौधरी ने इस कार्य का श्रीगणेश किया, तो उनकी बहन श्रीमती सुनीता राय ने भी निःस्वार्थ भाव से अपने स्वामित्व की भूमि विद्यालय को समर्पित कर दी। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भी, इस दम्पत्ति ने स्थानीय दलित बस्ती के बच्चों की शिक्षा हेतु प्राथमिक विद्यालय की स्थापना हेतु राज्य सरकार को निजभूमि दान में दी थी। यह सम्पूर्ण क्षेत्र शैक्षणिक रूप से अत्यन्त पिछड़ा रहा है। यहाँ के बच्चों की विषम आर्थिक–सामाजिक स्थिति को देखते हुए इस विद्यालय की संकल्पना एक सेवाभावी–प्रयास के रूप में की गई। उद्देश्य था—ऐसे बच्चों को शिक्षा देना जो स्वयं विद्यालय नहीं पहुँच सकते, परन्तु यदि शिक्षा उनके द्वार पर लाई जाए, तो वे भी गरिमा के साथ समाज की मुख्यधारा में जुड़ सकें। इस विद्यालय का आरम्भ नर्सरी से तीसरी कक्षा तक सीमित रहा, किन्तु प्रत्येक वर्ष इसमें एक-एक कक्षा का विस्तार होता गया और अब यह माध्यमिक स्तर तक पहुँच चुका है। यहाँ विशेष रूप से समाज के वंचित, वीतराग तथा असहाय वर्ग के बच्चों को शिक्षा से जोड़ते हुए समता, समरसता और न्याय की भावना को मूर्त रूप दिया जाता है। समय–समय पर यहाँ देश की कई जानी–मानी हस्तियाँ, समाजसेवी, शिक्षाविद् एवं गाँधीवादी चिन्तक विद्यार्थियों को सम्बोधित और प्रेरित करने के लिए आते रहे हैं। यह विद्यालय न केवल शिक्षा का केन्द्र है, बल्कि यह उस सेवा–भावना की सजीव अभिव्यक्ति है, जिसे स्वर्गीय इन्द्रदेव शर्मा और सुशीला शर्मा जी ने अपने जीवन–मूल्यों और त्याग से जीवंत किया था।